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Thursday, August 20, 2015

बेटियाँ


भोर की उजली किरण-सी घर में आएँ बेटियाँ
साँझ की लाली लजीली बन के जाएँ बेटियाँ।

ये चिरैयों सी फुदकती, द्वार, देहरी, आँगने,
जो मिला चुगकर उसे ही चहचहाएँ बेटियाँ।

नाप लें अपनी उड़ानों में गगन की दूरियाँ
फड़फड़ाए पर न कह पाएँ व्यथाएँ बेटियाँ।

ये सरल मन की किताबें बाँच तो लेना ज़रा
प्राण में होंगी ध्वनित पावन ऋचाएँ बेटियाँ।

वार दें सर्वस्व अपना जो कुलों की आन पर
पुत्र कुल दीपक अगर तो हैं शिखाएँ बेटियाँ।

कीर्ति की उज्ज्वल पताका कम इन्हें मत आँकिये
दो कुलों को तारती ये तारिकाएँ बेटियाँ।

ये लिए तूफ़ान भी, इनमें अतल गहराइयाँ
आब मोती सी सजाएँ सीपिकाएँ बेटियाँ।

ज़िंदगी की धूप तीखी छाँह भी मुमकिन न हो
मानिए सच यों लगें शीतल हवाएँ बेटियाँ।

Tuesday, August 18, 2015

विघ्न

सच है, विपत्ति जब आती है,
कायर को ही दहलाती है,
शूरमा नहीं विचलित होते,
क्षण एक नहीं धीरज खोते,
विघ्नों को गले लगाते हैं,
काँटों में राह बनाते हैं।
मुख से न कभी उफ कहते हैं,
संकट का चरण न गहते हैं,
जो आ पड़ता सब सहते हैं,
उद्योग-निरत नित रहते हैं,
शूलों का मूल नसाने को,
बढ़ खुद विपत्ति पर छाने को।
है कौन विघ्न ऐसा जग में,
टिक सके वीर नर के मग में
खम ठोंक ठेलता है जब नर,
पर्वत के जाते पाँव उखड़।
मानव जब जोर लगाता है,
पत्थर पानी बन जाता है।
गुण बड़े एक से एक प्रखर,
हैं छिपे मानवों के भीतर,
मेंहदी में जैसे लाली हो,
वर्तिका-बीच उजियाली हो।
बत्ती जो नहीं जलाता है
रोशनी नहीं वह पाता है।
पीसा जाता जब इक्षु-दण्ड,
झरती रस की धारा अखण्ड,
मेंहदी जब सहती है प्रहार,
बनती ललनाओं का सिंगार।
जब फूल पिरोये जाते हैं,
हम उनको गले लगाते हैं।
वसुधा का नेता कौन हुआ?
भूखण्ड-विजेता कौन हुआ?
अतुलित यश क्रेता कौन हुआ?
नव-धर्म प्रणेता कौन हुआ?
जिसने न कभी आराम किया,
विघ्नों में रहकर नाम किया।
जब विघ्न सामने आते हैं,
सोते से हमें जगाते हैं,
मन को मरोड़ते हैं पल-पल,
तन को झँझोरते हैं पल-पल।
सत्पथ की ओर लगाकर ही,
जाते हैं हमें जगाकर ही।
वाटिका और वन एक नहीं,
आराम और रण एक नहीं।
वर्षा, अंधड़, आतप अखंड,
पौरुष के हैं साधन प्रचण्ड।
वन में प्रसून तो खिलते हैं,
बागों में शाल न मिलते हैं।
कङ्करियाँ जिनकी सेज सुघर,
छाया देता केवल अम्बर,
विपदाएँ दूध पिलाती हैं,
लोरी आँधियाँ सुनाती हैं।
जो लाक्षा-गृह में जलते हैं,
वे ही शूरमा निकलते हैं।
बढ़कर विपत्तियों पर छा जा,
मेरे किशोर! मेरे ताजा!
जीवन का रस छन जाने दे,
तन को पत्थर बन जाने दे।
तू स्वयं तेज भयकारी है,
क्या कर सकती चिनगारी है?
By Ramdhari singh dinkar

जीवन की भाग-दौड़ में

जीवन की भाग-दौड़ में -
क्यूँ वक़्त के साथ रंगत खो जाती है?
हँसती-खेलती ज़िन्दगी भी आम हो जाती है।
एक सवेरा था जब हँस कर उठते थे हम
और
आज कई बार
बिना मुस्कुराये ही शाम हो जाती है!!
कितने दूर निकल गए,
रिश्तो को निभाते निभाते
खुद को खो दिया हमने,
अपनों को पाते पाते
लोग कहते है हम मुश्कुराते बहोत है ,
और हम थक गए दर्द छुपाते छुपाते
"खुश हूँ और सबको खुश रखता हूँ,
लापरवाह हूँ फिर भी सबकी परवाह
करता हूँ.
मालूम हे कोई मोल नहीं मेरा.....
फिर भी,
कुछ अनमोल लोगो से
रिश्ता रखता हूँ......!
--हरिवंशराय बच्चन

दरमियान!

चंद लाइनें बहुत ही खूबसूरत अगर आप तक पहुँच सकें....।

फजूल ही पत्थर रगङ कर आदमी ने चिंगारी की खोज की,
अब तो आदमी आदमी से जलता है..!
मैने बहुत से ईन्सान देखे हैं,जिनके बदन पर लिबास नही होता।
और बहुत से लिबास देखे हैं,जिनके अंदर ईन्सान नही होता।
कोई हालात नहीं समझता ,कोई जज़्बात नहीं समझता,
ये तो बस अपनी अपनी समझ की बात है...,
कोई कोरा कागज़ भी पढ़ लेता है,तो कोई पूरी किताब नहीं समझता!!
"चंद फासला जरूर रखिए हर रिश्ते के दरमियान!
क्योंकि"नहीं भूलती दो चीज़ें चाहे जितना भुलाओ....!...
..एक "घाव"और दूसरा "लगाव"...

सपनों के बाग़

मेरे पास नहीं है कोई चीज़ तुम्हें देने को, साथी !
मैं तो बस, केवल ख़्वाब लुटाया करता हूँ -
हर मुर्दा दिल में फिर जीवन की आग जलाया करता हूँ ।

लो, यह सपना तुम नई सुबह की लाली का
यह सपना खेतों की साझी हरियाली का
यह मिल पर सब मज़दूरों के हक़ का सपना
यह नई ज़िन्दगी और नए जग का सपना
यह दुनिया के सब लोगों के हिलमिल कर रहने का सपना
यह देशों-रंगों-नस्लों की दीवारें ढ़हने का सपना
यह मंदिर-मस्जिद-चकलों-पागलखानों बिना
समाज चलाने का सपना
यह जेल-कचहरी, फौज-पुलिस के बिना
जगत का राज चलाने का सपना

यह सपना जिसमें हर मानव स्वाधीन और सक्षम होगा
हर भेद-भाव होगा समाप्त, मानव मानव के सम होगा
ये सब सपने सच बनने को बेताब, लुटाया करता हूँ
हर मुर्दा दिल में फिर जीवन की आग जलाया करता हूँ ।

यों स्वप्न लुटाने वाले तो बहुतेरे हैं
लेकिन कुछ अलग तरह के सपने मेरे हैं
कुछ सपने बूढ़े औ’ बीमार हुआ करते हैं
कुछ लूले-लंगड़े होते हैं, बेकार हुआ करते हैं
कुछ सपने बेबस होते हैं जो महज आह भरते हैं
कुछ हिम्मत वाले चट्टानों को तोड़ राह करते हैं,
कुछ सपने मन के चोर हुआ करते हैं, छिपकर रहते हैं
कुछ सपने बाग़ी होते हैं, जो कहना हो सो कहते हैं
कुछ सपने किसी एक की कुंठाओं की सृष्टि हुआ करते हैं
कुछ सपने सारे युग-समाज की दृष्टि हुआ करते हैं

मैं लुटा रहा हूँ सबको ऐसे सपने
जो सबके साझे हैं, सबके हैं अपने
कविता की धरती पर मैं, सपनों के बाग़ लगाया करता हूँ
हर मुर्दा दिल में फिर जीवन की आग जलाया करता हूँ ।

यह जीवन क्या है? कुछ सपनों का मेला है
इंसान हमेशा सपनों से ही खेला है
ये सपने ही हैं जो उसके क़दमों की ताक़त बनते हैं
ये सपने ही हैं जो उसके तन-मन की कुव्वत बनते हैं
ये सपने ही इंसानों की रूहों को हरारत देते हैं
इंसान नहीं ये सपने ही इन्सां को बग़ावत देते हैं
ये सपने हैं जो दुनिया को हर बार सँवारा करते हैं
सपनों के बल पर लोग यहाँ हर जुल्म गवारा करते हैं
सपनों के बिना इन्सान महज कुछ साँसों का पुतला-सा है
सपने न बुलन्दी दें जो इसे, इंसान बहुत छोटा-सा है
ये सपने दिन का उजाला हैं, और सांझों के सिन्दूर हैं ये
ये सपने चाँद हैं रातों के, बेबाक सुबह के नूर हैं ये

मैं स्याह अँधेरी रातों में महताब उगाया करता हूँ
हर मुर्दा दिल में फिर जीवन की आग जलाया करता हूँ ।

Monday, August 17, 2015

एक अर्से बाद



एक अर्से बाद


तुम्हें देखना

जैसे सारंगी पर रामनारायण से राग पीलू सुनना

वैसे ही सिकुड़ जाती हैं चेहरे की शिराएँ
और कुछ-कुछ वैसी ही टीस अनुभव होती है
आँतों में कहीं गहराई पर !
तुम्हारे साथ चलना
जैसे रेरिख़ के शोख़ रंगों के मायालोक में घूमना
वैसी ही अपने आप को हवा में बिखेर देने की-सी इच्छा
एक ख़ुशबू की तरह भार-मुक्त हो जाने की-सी अवस्था ।

तुम्हें प्यार करना
जैसे भारती की रंगीन गुलाबों की घाटियों में से गुज़रना
नसों के रेशमी तूफ़ानों के रास्तों से निकलना
और बादल-धुले कचनारों की नरमाइयों के आकाश में तैरना !